दंगा…

#दिलसे #DilSe

शहर…

#दिलसे #DilSe

आग…

#दिलसे

आग…

#दिलसे

कब तक…

कब तक
सड़कों पर ख़त्म होना
धुँए में फेफड़ों को पिरोना
इस भाग-दौड़ में रोज ही
भीड़ में खुद को खो देना
कब तक

तन्हा…

तन्हा शहर के खुशनुमा लोग,
अकेले जीने का कैसा ये रोग।

ये शहर…

ये शहर चमकता है
चाँदनी सा,
ख़त्म करता रोज कुछ
आदमी का।
एक अजीब सी दौड़
चारों ओर,
रातें निगल जाती यहाँ
हर भोर।
थोडा और पाने की चाह
कुछ यूँ,
हद्द से गुजर जाने का
उसमें जुनून।
चढ़कर दूजे के काँधे भी
पाना सब,
तरक्की की यहाँ पर
परिभाषा अजब।
कुछ अनजानी सी बेचैनी
हर पहर,
बहुत कुछ छीन लेता है
ये शहर।

Flame

aaj ki shairi

Candid Conversations by Rinku Bhardwaj

My honest take on personal excellence, a journey of becoming better version of myself through my experiences, interactions or readings!

Umesh Kaul

Traveler!!!! on the road

What do you do Deepti

Exploring madness***

आज सिरहाने

लिखो, शान से!

abvishu

जो जीता हूँ उसे लिख देता हूँ

Bhav-Abhivykti

This blog is nothing but my experiences of life and my thoughts towards the world.

Ruchi Kokcha Writes...

The Shards of my Self

%d bloggers like this: