तिरंगा..

सड़कों पर आज देख तिरंगा बिकता,
वतन फिर हमको याद आया है।

#दिलसे

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सरज़मीं..

वतन पर हम मिट जाया करते हैं
ज़ुबाँ से इक आह भी नहीं करते,
सरज़मीं से इश्क़ क्या बला है
समझाते हैं दुश्मन को लड़ते-लड़ते।

बुलेट-ट्रेन..

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए…

Dil Se...

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो देहात को शहर की शक्ल दे,
गरीब को अमीरों सा बल दे,
किसान को हर साल लहलहाती फसल दे।

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो देश से भर्ष्टाचार को ले जाये दूर,
रिश्वत देने को न हो आम आदमी मजबूर,
दो वक़्त की रोटी खा पाएं मजदूर।

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो जाती-धर्म की नफरत को दूर छोड़ आए,
हर माँ चैन से अपने घर में सो पाए,
बहनें अब और अपनी इज्जत न लुटवाएं।

एक बुलेट- ट्रेन चाहिए,
जो गति के साथ नयी सोच का करे प्रवाह,
देश को दिखे एक नयी राह,
बस इतनी से है मेरी चाह।

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वतन..

वतन पर मर मिटने की बात करते हो,
सड़क की ख़ाक कभी छानकर देखो।
निकलो बाहर अब मकानों से अपने,
धूल को भी तो कभी फांक कर देखो।
लिखकर जताना देश से प्यार आसां है,
सियासतदानों से दो हाथ कर कभी देखो।
जताने और निभाने में फासला है काफी,
खुद को ज़मीं पर कभी आजमाकर देखो।

उबल रहा है…

कुछ बदल रहा है,
सब जल रहा है।
धर्म का धुआँ,
समाज निगल रहा है।

मैं हिन्दू हूँ,
और तू मुस्लिम।
आज हर ओर,
यही चल रहा है।

बाँट कर समाज,
फैला सांप्रदायिक उन्माद।
कुछ लोगों का,
धंधा फल रहा है।

रोज दंगों की खबर,
खौफ हर पहर।
एक बार फिर,
ये देश उबल रहा है।

हाँ मैं भी हिन्दू हूँ..

इंसान को इंसान समझता हूँ
धर्म के तराजू में तोलता नहीं,
तुम जैसी सोम्य और सभ्य
भाषा कभी बोलता नहीं।
बात-बात पर देना गाली
पर खुद को दिखाना महान,
धर्म के नाम पर बाँटना लोग
साधू-वेश में दे-दे व्याख्यान।
हाँ मैं भी हिन्दू हूँ
पर तुम्हारी परिभाषा से कोसों दूर,
मेरे दिल में भी देश बसता है
बस हूँ नहीं नशे में चूर।

बुलेट-ट्रेन..

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो देहात को शहर की शक्ल दे,
गरीब को अमीरों सा बल दे,
किसान को हर साल लहलहाती फसल दे।

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो देश से भर्ष्टाचार को ले जाये दूर,
रिश्वत देने को न हो आम आदमी मजबूर,
दो वक़्त की रोटी खा पाएं मजदूर।

एक बुलेट-ट्रेन चाहिए,
जो जाती-धर्म की नफरत को दूर छोड़ आए,
हर माँ चैन से अपने घर में सो पाए,
बहनें अब और अपनी इज्जत न लुटवाएं।

एक बुलेट- ट्रेन चाहिए,
जो गति के साथ नयी सोच का करे प्रवाह,
देश को दिखे एक नयी राह,
बस इतनी से है मेरी चाह।

Just like that

reach out and touch someone.....

Umesh Kaul

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aaiye, kuchh likhte hain..

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Bhav-Abhivykti

This blog is nothing but my experiences of life and my thoughts towards the world.

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