Don’t know where I have gone…

Long walks down misty mountains
Two of us getting drenched in the rain
Little raindrops making you go insane
Those dreams went down the drain
Though you are not here anymore
But I still keep looking at that door
Waiting for you from dusk to dawn
Don’t know where I have gone!

#DilSe #OtavioPaz

वक़्त…

#वक़्त #दिलसे

चाँद

​रात भर चाँद झाँकता रहा खिड़की से
और ढूँढता रहा तुम्हे आग़ोश में मेरे,
उसे शायद इस बात की खबर नहीं की
अब तुम मेरे ख़्वाबों तक में नहीं हो।

रात भर चाँद पूछता रहा तुम्हारा पता
और देख भर लेने की मिन्नते करता रहा,
उसे शायद इस बात की खबर नहीं की
अब मुझे तुम्हारी कोई खबर ही नहीं।

रात भर चाँद भरता रहा सिसकियाँ
और कतरों से सींचता रहा मेरा दामन,
उसे शायद इस बात की खबर नहीं की
अब तुम आँसुओं से दूर ही रहती हो।

रात भर चाँद को समझाया था मैंने बहुत
और तुम्हें भुला देने की नसीहत भी दी,
उसे शायद इस बात की खबर नहीं की
अब तुम एक नए आसमान का सितारा हो।

#दिलसे

कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें…

यूँ तो रोज़ ही लिखता हूँ
कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें खींचता हूँ।
शब्दों को शक्ल देने की कोशिश में
ख़्यालों को अपने निचोड़ता हूँ।
कुछ उभरते हुए शब्दों को बांधकर
कलम की स्याही मैं उडेलता हूँ।
कागज़ पर उभरे उन ज़ख़्मी शब्दों को
फिर जब पलट कर देखता हूँ।
तो खुद की रूह का बहता सुर्ख लाल लहू,
एक ज़ख़्मी साये सा लथपथ बड़ा हाथ
मेरी और बढ़ता सा नज़र आता है।

#दिलसे

तुम्हारा फ़ोन नहीं आया…

​बहुत बेचैनियां सी हैं अजब उदासी घेरे है
तुम्हारी यादों के पल ही बस कहने को मेरे हैं
ढूंढना दिल के कोनों में हर रोज ही तुम को
सोचना याद करते हो क्या तुम भी अब मुझको
पूछते हो मेरे बारे में कई लोगों ने है ये बतलाया
मिलना चाहते हो तुम भी ऐसा एक ख़्याल है आया
ऐसे कई नामुमकिन ख़्वाबों से दिल को है झुठलाया
फिर बहुत मुश्किल से आज ख़ुद को है समझाया
तुम्हारा फ़ोन नहीं आया, तुम्हारा फ़ोन नहीं आया।

#दिलसे

गर्मी की छुट्टियां…

मुझे तो बस वो बचपन याद है,
जब गर्मी की छुट्टियों का मतलब सिर्फ गाँव होता था।
सोमनाथ के मेले से एक दिन पहले,
दिल्ली से बस पकड़कर सारा परिवार पहाड़ होता था।
बस अड्डे पहुँचते ही मेरी वो ज़िद्द,
चाचा चौधरी की किताबों के लिए कितना मैं रोता था।
सीटों को घेरने का हुनर बाहर हीे,
हर परिवार में ऐसा कोई न कोई छुपा रुस्तम होता था।
बस चलने का वो बेसब्री से इंतज़ार,
ग़ाज़ियाबाद पार कर खुली हवा का एहसास होता था।
रास्ते में भूख लगती थी सबको जब,
आलू की सब्जी और रोटी में भी गजब स्वाद होता था।
रामनगर से पकड़ना मासी की बस,
भतरोजखान पहुँचने तक मेरा बहुत बुरा हाल होता था।
खड़ा भी बहुत मुश्किल से हो पाना,
लेकिन रायता पकोड़ी खाने को बिल्कुल तैयार होता था।
भिक्यासेन से रामगंगा का बहना साथ,
भुमिया मंदिर देख मासी पहुँचने का एहसास होता था।
वो पुराने लकड़ी के पुल को पार करना,
अब तक बस घर पहुचने को हर कोई बेकरार होता था।
कच्चे टेड़े-मेडे रास्तों की खड़ी चढाई,
गाँव में परिवार के लोगों को भी हमारा इंतज़ार होता था।
चूल्हे की रोटी खेतों में भागना नदी में नहाना,
इन छोटी-छोटी बातों में ही दिन बिताना मज़ेदार होता था।
नानी के घर कुछ दिनों के लिए जाना,
ख़ास मेहमानों की तरह जहां अलग ही सतकार होता था।
पूरे दो महीनों की छुट्टियां बिता देना यूँ ही,
फिर याद आना स्कूल का काम ऐसा हर साल होता था।
अब कहाँ वैसी छुट्टियां और वो बचपन,
फ़िर भी दिल हर छुट्टी में पहाड़ जाने को बेकरार होता है।

Tum Yaad Aayi .. by Pankaj Rawat

I penned and recited this….

Aaj Sirhaane

Gustaakhiyaan Inder

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Just like that

reach out and touch someone.....

Umesh Kaul

Traveler!!!! on the road

Yes I am "Deepti"

I am proud to be **

Aaj Sirhaane

aaiye, kuchh likhte hain..

abvishu

जो जीता हूँ उसे लिख देता हूँ

angelalimaq

food, travel and musings of a TV presenter.

Bhav-Abhivykti

This blog is nothing but my experiences of life and my thoughts towards the world.

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