धर्म…

#दिलसे #DilSe

धर्म…

#दिलसे #DilSe

धर्म के खुदा…

धर्म के खुदाओं से
ज़हर उगलने वाले
उनके आकाओं से
जाकर ये पूछे कोई
कब तक पाखंडों से
अपने इन षडयंत्रो से
बस जीना भर जो चाहें
उन्हे काटते तुम रहोगे?

खोखले अपने विचारों
और झूठ के सहारों से
चैन से जी रहे हमारे
समाज को बांटते रहोगे
जलते घर बिलखते बच्चे
तुम्हारे भी हो सकते हैं
अपनों को खोने का दर्द
कैसे भला तुम समझोगे?

पहचान..

सिर्फ रंगो से अब तो पहचाना मैं जाता हूँ,
भगवा में हिन्दू हरे में मुस्लमान कहलाता हूँ।

नन्ही लाशें…

नन्ही लाशों को लाये काँधे पर उठाये,
सुबह ही जो अपने हाथों से नहलाये।
चेहरा जी भर देख लूं ज़रा चादर तो हटाना,
बोलकर गया था माँ आज खीर बनाना।
गालों को उसके चूम लूं में बस एक बार,
कितनी जतन् से सुबह किया था तैयार।
नन्ही उंगलियो को थाम लूं पल भर और,
रोक लेती उसे जो चलता मेरा जोर।
आज आखिरी बार इसे गले से लगाऊँ,
खुद को ये बात भला कैसे मैं समझाऊँ।
इन मासूमों को मार हासिल क्या हुआ,
जमाने भर की लगेगी तुम्हे बददुआ।
इतना नाज़ुक बदन छलनी-छलनी कर डाला,
याद रखना तुम्हे वो माफ़ नहीं करने वाला।

(शायद कुछ ऐसे ही ख्याल हर उस मासूम की माँ के दिल में आए होंगे, जब अपने दिल के टुकडे को गोलियों से छलनी बेजान पाया होगा)

उबल रहा है…

कुछ बदल रहा है,
सब जल रहा है।
धर्म का धुआँ,
समाज निगल रहा है।

मैं हिन्दू हूँ,
और तू मुस्लिम।
आज हर ओर,
यही चल रहा है।

बाँट कर समाज,
फैला सांप्रदायिक उन्माद।
कुछ लोगों का,
धंधा फल रहा है।

रोज दंगों की खबर,
खौफ हर पहर।
एक बार फिर,
ये देश उबल रहा है।

मंदिर-मस्जिद..

धर्म की दुहाई मत दो, ना बाँटो लोगों को;
मिलता है जो मंदिर में, वही मस्जिद में भी पाया जाता है।

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